Detailed Notes on अहंकार की क्षणिक प्रकृति: विनम्रता का एक पाठ

दुनिया मेरे आगे: अहंकार की परिणति ही विनाश है ‘कै’ ने। सारी गड़बड़ी किसने करी है? ‘कै’ ने। तो हट जाने दो न। ये सब हटाओगे भी तो कौन हटेगा? ‘कै’ हटेगा, ‘मैं’ थोड़े ही हटेगा। और सात्विकता अगर तुम्हारी गहरी और सच्ची है, तो एक बिंदु आता है जब तुम इस प्रश्न से, इस बोझ से भी मुक्त हो जाते ह

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